क्या ईश्वर या खुदा बहरा है ?

क्या बहरा हुआ खुदा ?

१५ वी शताब्दी में हमारे देश के महान संत कबीर ने अपने एक दोहे के माध्यम से एक महत्वपूर्ण प्रश्न “क्या ईश्वर बहरा है ?” पूछते हुए जन साधारण को यह सिख देने का प्रयास किया था की ईश्वर ,खुदा ,परमात्मा ,अल्लाह या भगवान बहरा नहीं है अत: उसके पास अपनी प्रार्थना ,अरदास ,अपनी पुकार पंहुचाने के लिए जोर शोर से चिल्लाना , हो हल्ला मचाना ,नारे लगाना और ढोल नगाड़े बजाना आदि की कोई आवश्कता नहीं है | वह तो घट घट में और हर व्यक्ति के ह्रदय में विराजमान है | आपके धीरे धीरे बोलने पर भी , यहाँ तक की मौन रहकर मन ही मन याद करने पर भी आपकी पुकार सुन लेता है,उसे जो भी करना है कर लेता है | वहाँ भाषा व् शब्दों का कोई महत्व नहीं है |

परन्तु समाज की वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लग रहा की उसके समस्त वर्गो ,जातियों ,धर्मो और सम्प्रादाओ को मानने वाले लोगो ने कबीर की उस वाणी को न सुनने के लिए अपने कानो में अंगुलिया ठूंस कर बहरे बनने का नाटक करते हुए यह सुनिचित करने में अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी उस वाणी का एक भी शब्द उनके कानो में न घुसने पाए | अत: कबीर का प्रश्न क्या ईश्वर बहरा हो गया है ? “ आज भी प्रासंगिक बना हुआ है | कबीर के समय के बाद भी हमारा समाज विकास के राह पर लगातार आगे बढ़ता जा रहा है और भविष्य में भी अविराम गति से बढ़ता रहेगा | आज प्रत्येक धर्म ,सम्प्रादाओ ,मत –मतान्तरों के अनुयायीयो की संख्या बढकर कई गुना हो चुकी है |आज के समय में तप प्रत्येक समुदाय ने अपने आराध्य की पूजा ,अर्चना , इबादत और प्रार्थना आदि करने के नये नये तरीके खोज निकाले है |

मनुष्य एक विचारशील प्राणी है अत: ऐसा होना अवश्यंभावी है मंदिरों , गुरुद्वारो और गिरजाघरो आदि की स्थापना के साथ –साथ मठो . धुणीयो , थानों ,चबूतरो ,मजारो और देवलो की मान्यताओ को महत्व देते हुए अपने घरो ,गलियों ,चौराहों पर भी अपने आराध्य की स्थापना करने में मनुष्य एक दुसरे की होड़ में लगा है | ऐसा लग रहा है की कुछ लोगो ने तो अपने देवी देवता इष्ट को अपनी कैद में बंद करने का प्रयास भी सफलता पूर्वक कर लिया है और उस कैद के मालिक की अनुमति के बिना और कई स्थानों पर तो टिकट खरीदे बिना आप उनके दर्शन नही कर सकते है |

भक्ति के भी विभिन्न स्वरूप पनप गए है | ईश्वर की भक्ति के नाम पर रात्री –जागरण , यज्ञ, कथा ,पाठ ,मेले ,सप्ताह आदि आयोजित किये जा रहे है | लोगो का ध्यान आस्था से अधिक अपनी भक्ति का प्रदर्शन करने पर अधिक हो गया है |क्या भक्ति प्रदर्शन .प्रचार ,प्रसार दिखावे की मुहताज है ? धर्म –कर्म के अधेय्ताओ को इस पर गहन चिन्तन करने की जरुरत है |

भक्ति के प्रदर्शन के लिए पंडाल –निर्माण , सार्वजानिक मार्गो के बीचोबीच समारोहों का आयोजन और ध्वनि विस्तारक यंत्रो का अधिकाधिक प्रयोग अब सामान्य बात हो चुकी है, इसमें किसी को भी किसी प्रकार का संकोच मात्र भी नहीं है | क्या ईश्वर तक अपनी बात पहुचाने का एकमात्र यही तरीका रह गया है ?

 

आजकल  प्रत्येक घर में कथा , कीर्तन ,पाठ ,रात्रि जागरण का आयोजन ,गणेश चतुर्थी पर गणेश मूर्ति की स्थापना एवं नवरात्री में दुर्गा माता की मूर्ति की स्थापना की जाती है | यह तो बहुत ही अच्छी बात है परन्तु इन समारोहों में ढोल नगाडो व् ध्वनि विस्तारक यंत्रो द्वरा रात दिन जोर जोर से गीतों का प्रसारण क्या अत्यधिक आवश्यक है ? क्या हो हल्ला मचाए बिना ईश्वर की भक्ति नहीं की जा सकती ? अपने अपने घरो में यदि हम शांतिपूर्वक भजन गायेंगे ,पाठ या स्तुति करेंगे तो भगवान हमारी प्रार्थना नही सुनेगा ? पता नही यह शोर –शराबा किस लिए किया जा रहा ? क्या ईश्वर तक अपनी  बात पहुँचाने के लिए? तो यह सिद्ध हो चूका की वह बहरा नहीं है | उसके लिए तो इतने जोर से हल्ला मचाने की कोई आवश्कता नहीं है |

क्या आपको ध्यान है की आपके इस शोर शराबा से आपके आस पास के लोग अपनी सामान्य बातचीत नहीं कर सकते | विधार्थी अपनी परीक्षा की तेयारी नहीं कर पा रहे है | लोग अपने अपने घरो में होते हुए भी चैन से नही रह सकते | जिन्हें सुबह जल्दी उठकर अपने कार्य करना है क्या वे आपके इस भक्ति प्रदर्शन से आहत नही हो रहे ? दिनभर कार्य में व्यस्त कामकाजी महिलाओ को शांति से काम करने का अवसर न देकर कही आप उनके साथ अन्याय तो नही कर रहे है |

कौनसा धर्म आपको यह सब करने की सिख दे रहा है? क्या आप बिना प्रदर्शन के अपनी भक्ति नहीं कर सकते ? क्या आपका आराध्य ध्वनि –विस्तारक –यंत्रो द्वारा शोर मचाए बिना नही सुन पाएगा ? याद रखिए ईश्वर बहरा नहीं है ,अत: भक्ति का सही अर्थ समझते हुए अपने , दुसरो को अनावश्यक कष्ट पहुचाए शांतिपूर्वक अपना समारोह सम्पन्न कीजिए |

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