जीतता ही रहेगा दु:शासन?

द्वापरयुग का दु:शासन तो पराजित कर दिया गया किन्तु आज का दु:शासन हर दिन विजयी हो रहा है श्री कृष्ण ने द्रोपदी के चीर को विस्तार देकर उस युग में ही सदैव के लिए स्त्री के सम्मान और महत्व को रेखांकित कर दिया था किन्तु आज वही चीर चिथड़ा बन गया |

बड़े दुःख की बात है की अन्यानेक देवियों का लीलास्थल और सम्पूर्ण विश्व को जीवन दर्शन ,ज्ञान का प्रदाता भारत में स्त्री के स्त्रीत्व को लुटकर वह सड़क प्र नग्न फेंकी जा रही है | सम्पूर्ण मानवता को कलंकित के देने वाला दुष्कर्म दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ रहा है | आगे –आगे बलात्कार की खबरे छपती जा रही है और पीछे –पीछे बलात्कार की खबरे बन रही है | बलात्कार कोई घटना नहीं बलात्कार एक स्त्री की आत्मा को रोंदकर उसके जन्मभर की नृशंस हत्या करने वाला ऐसा कुकर्म है ,जो कभी अतीत नहीं बनता | जहाँ स्त्री को श्रेष्ट सर्वोपरि और पुर्वत्व प्रदात्री बताकर स्वयं शिव अर्धनारीश्वर कहलाए , हमारा देश भारत पिता नहीं , भारत माता कहलाया , वहाँ न आज दो माह की बच्ची सुरक्षित है और , न पैंतालिस वर्ष की माँ |

इस विषय पर हम सरकार की बात नहीं करते क्योंकि उससे तो हमे केवल इस दुष्कर्म को कर चुके लोगो को कड़ा दण्ड देने की अपेक्षा है | इस निमित्त बड़ी संख्या में लोगो द्वारा पुरजोर प्रयास किये जा रहे है | हम तो उस मानव की बात कर रहे है ,जो वासना चलित पुतला बन चूका है | जिससे मानवता की सारी सीमाएं लांघ कर , नैतिकता को जलाकर स्वयं को हर उचित अनुचित कर्म के लिए स्वतंत्र कर लिया है ,जिसके लिए कोई अब ना बेटी है , न बहन |

आखिर वो कौनसी कामनाएं और भाव है , जो किसी नारी को देखने के दृष्टीकोण में वासना को स्थापित के देते है | कन्या के चरण धोकर नवदुर्गा की आराधना पूर्ण करने का भाव तब कहाँ तिरोहित हो गया ,जब दो माह की बच्ची भी पशुता का शिकार बनी | कन्यादान करके कोटि दान का पुण्य बटोरने वाला वह पिता कैसा है ,जिसने अपने ही अंश को नोंच खाकर कोटि पाप एकत्रित कर लिए | वो भाई कैसा है , जिसने सहोदरा को ओरो से तो रक्षा का वचन दिया ,पर खुद ही ने भक्षक बनकर राखी के धागों को तार –तार कर डाला |

जो कुकर्म कर चुके उसे फांसी की सजा मिले अथवा उन्हें नपुंसक बना दिया जाए , इस आशा से की दुष्कर्मी तो इस कुकृत्य की पुनरावृति कर ही नहीं सकेंगे ,पर जो करने की योजनाएं बनाए बैठे है ,वे इस कुविचार को दण्ड के भय से त्याग देंगे | हम भी मुक्त कण्ठ से इस मांग का समर्थन करते है | समाज में ऐसा कानून क्रियान्वित होना चाहिए की कुकर्मियो के लिए दुष्कर्म का विचार तक रोंगटे खड़े कर देने वाला बन जाए | किन्तु मात्र यह दण्ड ही महिला सुरक्षा का एकमेव उपाय नहीं है | दण्ड के भय से दुराचारी आज या क्ल तक रुक सकता है किन्तु जो वासना उन्हें अपनी ही बहन बेटी दुष्कर्म करने से नहीं रोकती , वो उन्हें दो दिन से ज्यादा रोक पायेगी ?

क्या ऐसी मानसिकता पैदा नहीं की जा सकती ,जिसके आलोक में हमे किसी को फांसी देने या नपुसंक बनाने की मांग ही न करनी पड़े | हम ऐसे प्रयास क्यों न करे की दुष्कर्म ही न हो | जितनी आवश्यकता कड़े कानून बनाकर इस कुकृत्य की पुनरावृति रोकने की , उससे कही अधिक आवश्यकता स्वानुशासित होकर इस जड़ से मिटाने की है |

देश के पुरुषो ! मेरे भाइयो ! हमारी संस्कृति ने नारी को रक्षणीया मानकर उसकी सुरक्षा का दायित्व तुम्हे सौंफा है | किसी एक भी क्षण वह अरक्षित न रह जाए , इसलिए जीवन के हर चरण पर पिता –भाई –पुत्र के रूप में तुम्हे रक्षक बनाया है फिर आज रक्षणीया अनाथ क्यों हो गयी , क्यों अपने जन्म को कोसने पर विवश हो गई ? आज पुन: आवश्यकता है की पुरुष वर्ग स्वनियंत्रित होकर अपने इस गुरुदायित्व को समझे और भली प्रकार निवर्हन करे | स्त्री के प्रति अपनी दृष्टी में सम्मान स्थापित करे | जैसे कथित दामिनी ने बिना किसी सम्बन्ध के भी हर बालक ,युवा और वृध्द के ह्रदय में आत्मीयता के भाव जगा दिएऔर करोड़ो लोग उसके दुःख को अनुभव कर उसके साथ न्याय की मांग की ,वैसे ही जब एक लड़की का रक्षक सड़क पर खड़ा अपरिचित युवक भी होगा ,तब बहुत सीमा तक हमे इस कलंक से छुटकारा मिल पाएगा |

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