बोध का अर्थ

बोध का अर्थ-

‘ बोध ’ परम अनुभव है जीवन का | इसमें ज्ञान व् प्रेम की पराकाष्ठा है जहाँ चरम ज्ञान व् परम प्रेम मिल जाते है. वही बोध प्रकट होता है | आम जीवन  में प्राय: सभी इससे वंचित रह जाते है | इसका कारण है – अनेक भ्रांतियां , जो व्यक्तित्व की गहराई में धँसी है , मन की परतो में धँसी है | ये भ्रांतियां कुछ इस ढंग से उलझी है की इनमे उलझकर समूचा जीवन स्वयं ही उलझन बन गया है इन्ही भ्रांतियां से उद्भ्रांत होकर प्राय: लोगो ने मान लिया है की विचारो का संग्रह ज्ञान है ,लेकिन यथार्थ इनसे भिन्न है | ज्ञान तो अनुभव् है , भ्रांतियो के मिटने के साथ विकसित होता जाता है |

यही सत्य प्रेम के बारे में भी है भ्रांतियो ने प्रेम को ईष्र्या ,आसक्ति व् अधिकार का पर्याय बना दिया है जबकि प्रेम तो पारस्परिक एकात्मता की रसीली रसधार है , जो प्रेम की अनुभूति पाने वाले को सभी बन्धनों से मुक्तकर व्यापक बनाती है | भ्रांतियां ज्ञान व् प्रेम में भेद करती है | इनके अनुसार ज्ञानी कठोर व् प्रेमी कोमल होते है | हालंकि यथार्थ में दोनों भ्रान्ति मुक्त , परिष्कृत व् करुणापूर्ण होते है | जो ज्ञानी है ,वही सच्चा प्रेमी होता है और निष्कपट प्रेमी ही सम्यक ज्ञानी होता है | जहाँ दोनों होता है वही बोध होता है |

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जहाँ बोध होता है ,वही मानव चेतना का शिखर होता है | ऐसे ही बोधपूर्ण  जापानी संत नान –इन के पास एक केथोलिक पादरी मिलने गए | उन्होंने उनसे कहा – “ मेरे पास ईसा के उपदेशो की एक पुस्तक है , यह मुझे अत्यंत प्रिय है | मैं इसे आपको पढकर सुनाना चाहता हूँ “  संत नान –इन ने कहा – “ अवश्य , यह मेरे ऊपर अनुग्रह होगा |” यह सुनकर पादरी ने ‘ दी सरमन आँन दी माउन्ट ’ की कुछ पंक्तिया पढ़ी | इन्हें सुनकर नान –इन भावविभोर हो गये | उनके आंसू बह निकले और वह ध्यान में स्थ्ति हो गये | ध्यान टूटने पर उन्होंने कहा – “ये तो बुध्द के वचन है ”, इन्हें सुनकर मैं धन्य हो गया “ यह सुनकर पादरी बोले – लेकिन ये तो ईसा की बाते है | इस पर संत नान –इन ने कहा –“ तुम जो भी नाम दो ,पर मैं कहता हूँ जहाँ ज्ञान व् प्रेम अपने शिखर पर होते है ,वहां बोध होता है ” जहाँ बोध होता है ,वहाँ बुध्द उपस्थित होते है , फिर उनका स्वरूप कोई भी क्यों न हो |

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