क्या आप जानते ! भारत के सभी भगवान राजाओ के घर ही क्यों पैदा हुए ?

मनुष्य ने जितनी सभ्यता विकसित की है वह श्रम से मुक्त हो जाने के लिए की है। जब भी कुछ लोग श्रम से मुक्त हो गये तो उन्होंने काव्य रचे, गीत लिखे, चित्र बनाये, संगीत का सृजन किया, परमात्मा की खोज की। इस प्रकार आदमी जितना श्रम से मुक्त होता है उतना ही उसे धर्म, संगीत और साहित्य को विकसित करने का अवसर मिलता है। कभी आपने सोचा है कि जैनों के चौबीस तीर्थंकर राजाओं के ही लड़के क्यों हुए.? बुद्ध राजा के ही लड़के क्यों हुए.? राम और कृष्ण राजा के लड़के क्यों हुए.? हिंदुस्तान के सब भगवान राजाओं के लड़के क्यों हुए.? उसका भी कारण है। एक दरिद्र आदमी जो दिन भर मजदूरी करके पेट नही भर सकता है, खाना नही जुटा सकता है, थका-मांदा रात को सो जाता है, सुबह उठकर फिर अपनी मजदूरी में लग जाता है—-उसके के लिए कहां का परमात्मा, कहां की आत्मा, कहां का दर्शन.?

दरिद्र समाज कभी धार्मिक नही हो सकता है। हिंदुस्तान दो – अढ़ाई हजार वर्ष पूर्व समृद्ध था तो वह उस समय धार्मिक भी था। लेकिन आज हिंदुस्तान इतना गरीब और दरिद्र है कि वह धार्मिक नही हो सकता है। मै आपसे दावे से कह सकता हूं कि रुस और अमेरिका आने वाले पचास वर्षों में एक नये अर्थ में धार्मिक होना शुरू हो जायेंगे। उनके धार्मिक होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

जब आदमी के पास अतिरिक्त संपति होती है, जब उसके पास श्रम की कमी के कारण समय बचता है, तब पहली बार आदमी की चेतना पृथ्वी से ऊपर उठती है और आकाश की ओर देखती है।

संतोष एक बहुत ही घातक शब्द है, हमें जड़ करने के लिए। हमारा दर्शन यह कहता है कि हम अपनी चादर में ही संतुष्ट हैं। हमारे हाथ पांव बढ़ते जायेंगे, लेकिन हम अपने को सिकोड़ते जायेंगे। चादर तो उतनी ही रहेगी—-छोटी की छोटी। तुम भीतर बड़े होते जा रहे हो। रोज कभी हाथ उघड़ जावेगा, कभी पांव उघड़ जावेगा, कभी पीठ उघड़ जावेगी और सिकुड़ते – सिकुड़ते जिंदगी कठिन होती जावेगी।

सिकुड़ना तो मरने का ढंग है।

तो मेरा ये कहना है कि जीवन के विस्तार का नियम यह नही है। जीवन के विस्तार का दर्शन यही कहता है कि हमें चादर का विस्तार करना है। हमेशा चादर के बाहर पैर फैलाओ, ताकि बाहर जाये और हमें यह चुनौती मिले कि चादर को हमें बड़ा करने का निरंतर प्रयास करना है। हिंदुस्तान कायर और सुस्त अकारण नही हो गया। हिंदुस्तान के सुस्त एवं कायर होने के पीछे तथाकथित बड़े बड़े लोगों का दर्शन है। अतः हिंदुस्तान के हर व्यक्तित्व को फैलाव चाहिए। हमें तकलीफ विरोधी दर्शन छोड़ना है और प्रतिभाओं को खुला अवसर देना है, साहसपूर्वक उनका फैलाव करना है।

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