रंगों का त्यौहार होली को कामाहोत्स्व क्यों कहा जाता है ??

होली बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय रंगीन त्यौहार है . राग -रंग का यह लोकप्रिय पर्व बसंत का सन्देश वाहक भी है . चूँकि यह पर्व बसंत ऋतु में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है , इसलिए इसे ‘ बसंतोत्सव ‘और ‘ कामाहोत्स्व ‘ भी कहा जाता है.

राग और रंग तो इसके मुख्य अंग है ही पर इनको अपने चरमोत्कर्ष पर पहूँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग -बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है . सर्वत्र वातावरण बड़ा ही मनमोहक होता है . यह त्यौहार फाल्गुन मास में मनाए जाने के कारण ‘ फाल्गुनी ‘ के नाम से भी जाना जाता है  और इस मास में चलने वाली बयारों का आनन्द का तो कहना ही क्या ..! हर प्राणी ,जीव इन बयारों का आनन्द लेने के लिए मदमस्त हो जाता है .  कोई तो अपने घरो में बंद होकर खिडकियों से झांककर इस रंगीन छटा का आनन्द लेता है और कोई खुले आम सर्व सम्मुख मदमस्त होकर लेता . यहाँ उम्र का कोई तकाजा नहीं , बालक ,युवक और बूढ़े हरकोई रंगीली मस्तियो में छा जाते है .

ये भी पढ़े –   भांग पीने से होंगे ये खतरनाक नुकसान

सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबेरुनी , जो एक प्रसिद्ध फ़ारसी विद्वान ,विचारक थे , ने भी अपनी एक एतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है | मुस्लिम कवियों ने भी अपनी रचनाओ में होली पर्व के उत्साहपूर्ण मनाए जाने का उल्लेख किया है .  मुगलकाल और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले है . अकबर का जोधाबाई के साथ और शाहजहाँ का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है. राजस्थान के एक प्रशिद्ध शहर अलवर के संग्रहालय के एक चित्र में तो जहाँगीर और नूरजहाँ के साथ होली खेलते हुए दर्शाया गया है .

होली भारत के सबसे पुराने पर्वो में से एक है . होली की हर कथा में समानता है की उसमे अधर्म पर धर्म की विजय और दुराचार पर सदाचार की विजय का उत्सव मनाने की बात कई गई है . इस प्रकार होली मुख्यत : आनन्दोत्सव तथा भाई चारे का पर्व है . यह लोक पर्व होने के साथ समाज में व्याप्त  बुराइयों के अंत का भी प्रतीक है . किसी कवि नें कहा है –

नफरतो के जल जाएं सब अम्बार होली में ,

गिर जाएं मतभेद की हर दीवार होली में .

बिछुड़ गए जो बरसो से ,प्राण से अधिक प्यारे ,

गले मिलने आ  जाएं वे इस बार होली में ..

बसंत पंचमी के आते  ही प्रकृति में नए परिवर्तन आने लगते है ,पतझड़ आने लगता है ,आम की मंजरियो पर भँवरे मंडराने लगते है , कही – कही पेड़ो पर नए पते भी दिखाई देने लगते है . प्रकृति में नवीन मादकता का अनुभव होने लगता है . इसी प्रकार होली का पर्व आते ही नई रौनक ,नए उत्साह और नई उमंग की लहर दिखाई देने लगती है |

होली ,जहाँ एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्यौहार है ,वही रंगों का त्यौहार भी है . हर उम्र ,हर वर्ग के लोग बड़े उल्लास से इस त्यौहार को मनाते है . इसमें जाति वर्ण का कोई स्थान नहीं है . इस पर्व को नवात्र्ष्टि पर्व भी कहा जाता है . खेत में नवीन अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद पाने की परम्परा है |

Holi-Festival
photo credit http://www.thebeautyoftravel.com/

होली एक आनन्दोत्सव है ,इसमें सभी लोग अपने पुराने गिले शिकवे भूलकर एक दुसरे के गले लग जाते है | इसमें जहाँ एक ओर उत्साह व् उमंग की लहर है , वही कुछ बुराईयां भी आ गई है , कुछ लोग इस अवसर पर अबीर गुलाल के अलावा कीचड़ ,मिट्टी ,गोबर इत्यादि से जंगलियो की भांति खेलते है | हो सकता है की उनके लिए ये ख़ुशी संवर्धन का कारण हो किन्तु जो शिकार होता है , वही व्यक्ति इस पीड़ा को समझ पाता है | ऐसा करने से प्रेम की बढ़ोतरी होने के बजाय नफरत का इजाफा हो जाता है . इसलिए इन हरकतों से किसी के ह्रदय को चोट पहुँचाने के बजाय कोशिश ये होनी चाहिए की प्रेम का अंकुर फूटे |

 

Sharing is caring!

Loading...

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!