शिक्षा समस्या क्यों ?

शिक्षा के दो स्र्तोत है – शब्द और जीवन व्यवहार |

कुछ बाते शब्दों के माध्यम से सिखाई जाती है | उसे आदमी ग्रहण भी करता है ,शब्द के माध्यम से | यह अच्छा है ,करो ,यह काम बुरा है ,मत करो – यह शिक्षा का शाब्दिक माध्यम है | आज से ५०० वर्ष पूर्व गाँव –गाँव में स्कूल नही थे , गुरुकुल थे | किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि उस वक्त लोग कम पढ़े लिखे थे | शब्दों के माध्यम से और अपने अनुभवो से उन्होंने शिक्षा का बहुत विकास किया | एक किसान या कारीगर का लड़का अपने काम में इतना कुशुल हो जाता था की आज आई ,टी.आई . और इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति उतना कुशल नही हो सकता | अनेक कहानिया और किस्से इस बात के साक्षी है की उन्होंने कितने आश्चर्यकारी काम किये थे | वह शिक्षा आनुवांशिकता के साथ ,उन्हें माँ की घुट्टी के साथ प्राप्त होती थी |

हमारी उस परंपरा को आज भुलाया जा रहा है , जो गाँव के लोगो को सहज रूप से प्राप्त होती थी | आज न तो पिता के पास समय है की वह बेटे को सिखाए , न माँ को फुर्सत है की वह बेटी को शिक्षा दे | बड़े घर की बेटी , जो करोडपति और अरबपति के घर में जा रही है , वह चूल्हा –चौका सम्भालने के काम में तो लगेगी नही , फिर यह सब सीखने का औचित्य क्या ?

आज एक ऐसी संस्कृति विकसित हुई है की वह रात के ९ -१० बजे कार में घर से निकलती है और किसी बड़े होटल में खाना खाकर देर रात गए घर लौटती है | घर के नौकर चाकर अपना भोजन बनाकर खा लेते है | इसी तरह दादी नानी की शिक्षा भी अब बीते जमाने की बात होती जा रही है | आज की मोर्डेन पीढ़ी उनकी बात पर क्यों ध्यान देगी ? उनकी सिख पर वे सिर्फ हँस सकते है और कुछ नहीं |

आज बड़े करुणादायक दृश्य देखने को मिलते है | ४ लडके है सब अच्छा कमा रहे है ,किन्तु बूढ़े माँ बाप की सम्भाल करने वाल कोई नहीं है | जिन्होंने अपने बच्चो के जीवन –निर्माण में पूरी उम्र गुजार दी , जीवनभर की कमाई उनकी शिक्षा पर झोंक दी , जीवन के अंतिम दौर से गुजर रहे है | कभी –कभी कुछ बेटे अपने माता –पिता के लिए नौकर की व्यवस्था कर देते है |

पहले जीवन –व्यवहार से शिक्षा मिलती थी आज शिक्षा का जो क्रम और स्थिति चल रही है ,उसके बारे में कुछ न कहना ही अच्छा है | कहे तो क्या कहे | शिक्षा का सबसे बड़ा स्रोत होता है जीवन का व्यवहार | वह नहीं तो फिर अनुपम जैसी  स्थिति बन जाती है | उसके लिए कोई तुलना नहीं , कोई उपमा नहीं | आज यह धारणा बनी हुई की महंगे और  लोकप्रिय शिक्षा संस्थान में पढ़ेगा और वहाँ से अच्छी डीग्री लेकर निकलेगा तो उच्च श्रेणी की नौकरी मिल जाएगी | उसका जीवन कैसा होगा, व्यवहार कैसा होगा ? इस बात पर विचार नही किया जाता है | पारिवारिक जीवन के प्रशिक्षण के अभाव में उसकी दिशा क्या होगी ? यह प्रश्न गौण हो जाता है |

सामजिक सम्बन्धो में इतनी दुरी पैदा हो रही है की संवेदना का स्र्तोत अब सूखता जा रहा है | इस पर थोडा चिंतन करने की आवश्यकता है | हमारा व्यवहार बदलना चाहिए , दृष्टिकोण या नजरिया बदलना चाहिए | परिवार ,गाँव ,समाज से कटकर जीवन में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकती | हासिल भी हो गई तो जीवन के लिए उसका कोई अर्थ नहीं होगा | माता –पिता का दायित्व है की वे अपनी संतान को पैसा कमाने की मशीन बनाने की बजाय मनुष्य बनाने पर ध्यान दे |

वह पुरानी शिक्षा पद्धति भुला दी गई | आज विधालय में अध्यापक विधार्थी से कोई शारीरिक श्रम कराना चाहे तो वह स्पष्ट रूप से इंकार कर देगा | कहेगा की पढने की हम फीस देते है | मुझे पढ़ाकर आप कोई एहसान नही करते | आपको इसके लिए भरपूर वेतन मिलता है | यह है, आज के विधार्थी की मानसिकता | गुरु शिष्य के सम्बन्धो में आज बहुत बदलाव आ गया है | आज शिक्षा में सिर्फ शाब्दिक शिक्षा चल रही है | वही सिखाया जा रहा है जो किताबो में लिखा है | व्यावहारिक शिक्षा से आज हर कोई वंचित रह जाता है |

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