इंसानियत पर कविता A Hindi Poetry By Sonam Satya

इंसानियत 

क्यों इंसान ही किसी इंसान में भेद करता है ,
इंसानियत के धर्म में जीने में खेद करता है ,
जहाँ चाँद सूरज का नूर हर दिशा में है
जहाँ कुदरत का दस्तूर हर सदा में है ,
वहाँ इंसान अपने ही मजहब में बैर करता है ,
प्यार के रिश्तों की अहमियत को भूलाकर
अपना रिश्ता नफरत की जंजीरों से जोड़ता है ,
क्यों इंसान ही किसी इंसान में भेद करता है
इंसानियत के दिल में बुराई के खंजर से छेद करता है ,
जिस प्रकर्ति की पनाहों में जीना सीखा
जिन बहारों के साथ फूलों सा खिलना सीखा
उसी सर – ज़मीं पर खुदगर्जी का कहर ढहाता है
अपनों के ही लहू को पानी सा बहाता है ,
इंसानियत के हर जज्बात को हैवानियत से मेट देता है
क्यों इंसान ही किसी इंसान में भेद करता है .

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