त्याग की आत्मिक भावना कैसी होनी चाहिए ?

त्याग क्या है और त्याग की आत्मिक भावना कैसी होनी चाहिए ?

 

वास्तविक त्याग की भित्ति है जगत में कर्म करना और जीवन यापन करना न की घर परिवार छोडकर जंगल में भाग जाने मात्र से ही आप सांसारिक जीवन की सचाई के मायाजाल से जागृत होने की आशा नहीं कर सकते |

वास्तविक त्याग का अर्थ है – कामना ( फल , अपेक्षा ) को त्यागकर कर्म करना ,वरना यही कर्म कामनात्मक रूप ले लेती है | बाहा कर्म पाप नहीं है ,बल्कि वैयक्तिक संकल्प ,मन और ह्रदय की जो अशुद्ध प्रतिक्रिया कर्म के साथ लगी रहती है और कर्म कराती है ,उसी का नाम पाप है |

कर्म करने के पुरुस्कार या उसकी शर्त के रूप में फल की कोई अहं पूर्ण मांग बिलकुल नहीं होनी चाहिए अथवा यह भी हो सकता है की फल बिलकुल मिले ही नहीं और फिर भी हमे एक कर्तव्य कर्म के रूप में कर्म करना चाहिए |

किसी अप्रिय ,अकाम्य या अतृप्तिकर कर्म के प्रति या जो कर्म अपने साथ दुःख ,विपदा ,विषम अवस्थाएं और अनिष्ट परिणाम लाता है या ला सकता है ,उसके प्रति कोई घृणा नहीं होनी चाहिए , क्योंकि वह भी जब एक कर्तव्य कर्म हो ,तब उसे पूर्णरूप से ,नि:स्वार्थ भाव से तथा उसकी आवश्यकता और प्रयोजन को गहराई के साथ समझते हुए अंगीकार करना चाहिए | जब तक हम इस देह में है तथा जीवित है ,तब तक कर्म रहित होना असंभव है | कर्म जीवन के दिव्य विधान अंग है सारा विश्व ब्रहमाण्ड ईश्वर का एक कर्म है |

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