भारत का एक ऐसा मंदिर जहाँ औषधि चढ़ाई जाती है !

आयुर्वेद संकाय में होती है ” रसेश्वर महादेव” की पूजा

जहाँ बाबा की नगरी घाटों ओर सकरी गलियों के लिए मशहूर है ,वही बाबा के लौकिक स्वरूपो का बखान कम नही।काशी में एक ऐसी मन्दिर है जहाँ विज्ञान भी नत्मस्तक करता है बाबा को,ये वो जगह है जहाँ से तमाम इलाजों की औषिधीय बनायी जाती है। यह मंदिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान, आयुर्वेद संकाय के रस शास्त्र विभाग “रसेश्वर महादेव”की है।जहाँ जो भी आयुर्वेदिक दवा बनती है वह पहले बाबा “रसेश्वर” को अर्पण की जाती है तब उसे मरीजो तक पहुँचाया जाता हैं।

कैसे शुरूआत हुई “रसेश्वर महादेव” की

पुराणों के दर्ज पन्ने में आपने भी कई अनेकों किदवंतियो को सुना होगा,जिसमे तमाम जड़ी बूटियों के बारे में बताया गया है।यह तो तय है कि आज के समय में हम जड़ी बूटियां का सहारा तो नही लेते लेकिन खुदा न खास्ता हमे कही न कही दवा ओर दुआ की जरूरत पड़ी ही जाती हैं।हमारी शरीर ईश्वर की ओर से हमें सबसे बड़ा वरदान है। क्यूँकि अगर कोई रोग उत्पन्न हो जाए तो हम धन, वैभव, सुख आदि का भोग नहीं कर पाते और कई बार रोग बहुत दीर्घ रूप धारण कर लेते हैं, कई उपचार किए जाएं, औषधि ली जाएं, किन्तु वे प्रभाव नहीं दिखाती है और जब रोग किसी भी उपाय से ठीक नहीं होता है तो उसे असाध्य रोग घोषित कर दिया जाता है।
परन्तु ऋषि-मुनि-ज्ञानियों ने तो ब्रह्माण्ड तक का भेदन किया है तो रोग की उनके समक्ष कोई कीमत नहीं।संसार में सर्वप्रथम कायाकल्प पर अगर किसी ने चर्चा की तो वह हमारे भारत के ऋषि-मुनि आदि ने ही की।प्राचीन भारत में और इस क्षेत्र में कई-कई शोध किए हमारे साधकों तथा सन्तों ने।आयुर्वेद और पारद के माध्यम से ऋषि-मुनियों ने असाध्य से असाध्य रोगो को ठीक करके दिखाया है। यही नहीं बल्कि पारद के माध्यम से कायाकल्प तक करने में समर्थ रहा है “रस तन्त्र”। यही कारण है कि आज भी उच्चकोटि की औषधि में संस्कारित पारद भस्म का प्रयोग किया जाता है, जो कि देह को रोगों से मुक्त करती है।
सन 1922 से 1932 के बीच बीएचयू  के महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय जी ने शिक्षा के साथ साथ लोगो को स्वस्थ रखने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा की स्थापना की। जिसमे महामना अपने दैनिक दिनचर्या के तहत आयुर्वेदिक फार्मेसी का निरीक्षण भी किया करते थे।उन्होंने आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण प्रक्रिया के तहत भस्मों के पाक के क्रम में अघोरेश्वर शिव शम्भू की आराधना के लिए सन 1950 में दत्रेय अनन्त कुलकर्णी ने आयुर्वेदिक फार्मेसी विभाग में रस शास्त्रीय प्रक्रियाओं के लिए भगवान शिव “रसेश्वर महादेव” की स्थापना करवाया। जिसके जज भगवान शिव को माना जाता है। आज भी यही प्रतिक्रिया को दोहराया जा रहा।

कैसे पहुँचे ” रसेश्वर महादेव” मन्दिर

वर्तमान में यह मन्दिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रस शास्त्र विभाग के नए नवनिर्मित भवन परिसर में औषधि जनक “रसेश्वर महादेव”मन्दिर का निर्माण करवाया गया है। जिसकी प्राण प्रतिष्ठा श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी प्रणव चैतन्यपुरी द्वारा 21 फरवरी को किया जाएगा। प्रो.आंनद चौधरी ने महामना के सिद्धांतों को आत्मसात करते हुए उनके वृत्ति से उपार्जित भिक्षादान से मन्दिर का निर्माण करवाया है। प्रो.आनंद चौधरी ने बताया कि मन्दिर प्रांगण में भगवान शिव के साथ साथ माता पार्वती ,पुत्र गणेश व कार्तिकेय जी की भी मूर्ति विराज्यमान है, साथ ही  महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की भी प्रतिमा स्थापित की गयी है।

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