भावुकता मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है

                          भावुकता

मनुष्य या सभी प्राणियों का संवेदनशील प्रवाह जिसके सामने दोष भी गौण हो जाते है जब यह भाव किसी में पनपता है तो सृष्टि की सभी निर्जीव व् सजीव वस्तुओं पर प्रभाव डालता है

श्रध्दा जब दीर्घकालीन होती है तो भावुकता का जन्म स्वभाविक नैसर्गिक है यह एक आत्मिक भाव है ,जो इंसानियत के रूप में स्वत ही प्रकट होती है | यह एक पहचान है उन भावो से अलग जो इन्सान को ओरो से पृथक करती है इसके अनेक रूप है | कभी –कभी नारी के वियोग के रूप में ,कभी माँ के पुत्र के वियोग में ,कभी अधूरी इच्छा के रूप में ,कभी अत्यधिक प्रसन्नता के भाव के रूप में ,जब इसका यह रूप सामने आता है तो प्राणी में क्षण भर के लिए सही उसमे आत्मिक भाव एवं उच्चकोटि की आत्मा के दर्शन होते है |

इस प्रवाह की परत तब खुलती है जब यहा तो जीव में प्रसन्नता का भाव या दुःख का भाव हो | परन्तु तब भाव के खुलने का एक महारास्ता प्रसन्नता और वियोग ही नहीं ,संस्कार का भी एक महत्वपूर्ण योगदान है जब मनुष्य में संस्कार होते है ,तो उसकी अन्तकरण की परत हमेशा ही खुली रहती है तथा वह थोड़े बहुत हर्ष या वेदना से भावुक हो जाता है |

ममत्व को ही भावुकता का पर्यावासी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी यह माँ का शिशु के प्रति नैसर्गिक भाव है जो जन्म से लगाकर उसके सम्पूर्ण जीवन तक उनसे जुड़ा हुआ रहता है |

ममत्व का अर्थ अत्यधिक भावुकता ,जो भाव कभी खत्म न होने वाला | यह एक अदृश्य धागा है जो उसके सन्तान के साथ बंधा रहता है | इसी अर्थ में संतान का माँ के प्रति समर्पण का भाव ही भावुकता है जो अक्ष माँ का होता है वही सन्तान का होता है |

जब मनुष्य नारी के सामने समर्पित होता है तो वो भावुकता का ही रूप होता है ,कामवश भी इन्सान नारी के साथ बलात्कार का व्यवहार कर भी लेता है तो एक क्षण ऐसा भी आता है कि भावुकता की परत स्वत ही खुल जाती है और उसे अपराधबोध कराने में सक्षम होती है |

इतिहास गवाह है कि इस भाव से ( भावुकता ) कई बड़े बड़े योध्दा , क्रूर व्यक्तियों ने बिना शर्त ही हत्यार डाल दिये भावुकता का रूप ऐसा होता है की कोई भी कितना भी बलशाली क्यों न हो उसको भी इस ब्रह्माण्ड में कभी बुराई नजर नहीं आती है यह अत्यधिक प्रभावशाली भाव है, जब यह जागृत होता है तो जीव का जीवन ही बदल जाता है | इस वेग के सामने तो घृणा ऐसे नतमस्तक हो जाती है जैसे बड़ी वेग से चली आ रही नदी के सामने कितनी भी कांटेदार मजबूत पेड़ भी उखड़ जाते है  ठीक उसी प्रकार जब भावुकता से परिपूर्ण व्यक्ति में घृणा और किसी के प्रति विरोधावास  का कोई स्थान नहीं रहता है |

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एतिहासिक दृष्टान्तो पर नजर डाले तो हम अंगुलिमाल के दृष्टांत से भावुकता का परिचय करवाते है | अजातशत्रु के समय अंगुलिमाल नाम का एक कुख्यात डाकू हुआ था वो हमेशा निर्दोष लोगो की हत्या करता था तथा अपने परिवार का भरन पोषण करता था अर्थात उसके जीवन में संस्कारो का अभाव था ,उसे अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं था कि प्राणी को कष्ट पहुँचाना या उसे सताना कितना घृणित पाप है क्योंकि उसके आत्मा पर ऐसी कभी चोट पड़ी न जिससे भावुकता की परत खुल सके तथा आत्मा जागृत हो, एक बार जब महात्मा गौतम बुध्द अंगुलिमाल से मिले तो उसने बुध्द को भी मारने के लिए तत्पर हो गया और हथियार उठा लिए | जब बुध्द ने उनसे बात की और उसे आत्मबोध करने के लिए कहा तो उसकी भावुकता की परत खुल गयी और अपराधबोध और अपने किये हुए अपराध के प्रति इतना भावुक हुआ कि उसने सन्यास धारण कर लिया |

भावुकता मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है यह ऐसा प्रभाव है जिनसे कभी किसी का नुकसान नहीं होता है बल्कि मनुष्य के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है |

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