21वीं सदी की ये कैसी तस्वीर? औरतें किसी भी देश, समाज, धर्म में सुरक्षित नही हैं

 यह कैसी 21वीं सदी है – 

दुनियां तनाव, युद्धों के बादलों, तेज होती सेनाओं, हजारों विपदाओं को झेल रही है, और सबका कारण कुदरत नही बल्कि हम इंसानो की खोती इंसानियत है। ऐसे में हर तरफ एक युद्ध के जैसा माहौल बना हुआ है। सरकारें, सेनाएं लड़ती रहें, कम फर्क पड़ता है, फर्क तो तब पड़ता है जब लड़ाई का परिणाम आम घरों, परिवारों, बच्चों, औरतों, बूढों को झेलना पड़ता है। सर्जिकल स्ट्राईक के बाद भारतपाक सीमा के निकट रह रहे लगभग 10 हजार गरीब किसानों और मजदूरों को अपने ठिकाने बदलने को कहा गया, ये अब अपने देश में अपने ही लोगों के बनाये शरणार्थी हो गए. इनकी गिनती दुनियां भर के उन 20 – 25 करोड़ शरणार्थियों में तो नहीं हो रही, जिन्हें युद्ध, गोलाबारी, भूख से बचने के लिए अपने खुशहाल घर छोड़कर दूसरे देशों में कच्चे-पक्के मकानों, टैंटों, सड़कों पर पनाह लेनी पड़ती है, पर उनकी तो अपने ही देश में हालत बहुत अच्छी नही है. शरणार्थियों के जत्थों में एक बात हर जगह सामान्य है, और वह है औरतों की मुसीबत। जब सिर पर छत न हो, चूल्हा, गैस न हो, खाने का सामान न हो, ठंड में गरम कपडे न हो, मैले कपडे हों, तो इन सब समस्याओं को हल औरतों को ही करना पड़ता है। उन्हें न केवल अपनी इज्जत की रक्षा करनी होती है, बेटियों को भी लुटे जाने से बचाना होता है, रात का खाना भी तैयार करना होता है. इन शरणार्थी शिविरों में जब भी सरकार का, किसी समाजसेवी संगठन का राहत देने वाला ट्रक पहुँचता है तो मर्दों से ज्यादा औरतें भागकर कुछ पाने के लिए भीड़ में कुचले जाने तक का जोखिम लेती हैं.

लड़ाइयां देश के नेता करवाते हैं, धर्म प्रचारक करवाते हैं, भाषा या रंगभेद के नाम पर उकसाने वाले करवाते हैं पर असली शिकार न सेनाएं होती हैं, न सरकारें, न धर्म प्रचारक, और न ही निति निर्धारक, शिकार तो बस औरतें होती हैं। हर रिफ्यूजी कैम्प के टैंटों के सामने खाली बैठे मर्द और कमरतोड़ मेहनत करती औरतें देखी जा सकती हैं. सुबह उठ कर खाने के इंतजाम से लेकर शाम तक हर आतंक का निशाना औरतें ही होती हैं. कई ऐसी जगह हैं, जहां हजारों औरतों को अगवा करके देहव्यापार में बेचा जा रहा है, और इंटेरनेट पर उनकी तस्वीरों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है. इलाका चाहें एशिया का हो, दक्षिणी यूरोप का हो, उत्तरी अफ्रीका का हो, या फिर दक्षिणपूर्व एशिया का हो, बिना धर्म, रंग,कद,भाषा के भेद के औरतों को रिफ्यूजी होने की कीमत चुकानी पड़ रही है.

यह कैसी 21वीं सदी है? यह कैसी इंटेरनेट क्रांति है? यह कैसा चांद और मंगल पर पहुँचने का दावा है? यह कैसा लोकतंत्र है? कि औरतें किसी भी देश, समाज, धर्म में सुरक्षित नही हैं. लानत है उन पर जो आधुनिक तकनीक का अंतिम निशाना औरतों को बना रहे हैं।

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